कैंसर की जांच और उसके इलाज की योजना बनाने में पॉज़िट्रॉन एमिशन टोमोग्राफी (PET) स्कैन एक बेहद अहम तकनीक है। इसे आमतौर पर PET-CT स्कैन भी कहा जाता है क्योंकि इसमें PET और CT दोनों की जानकारी को जोड़ा जाता है।
PET स्कैन में शरीर की कोशिकाओं की गतिविधि (activity) और चयापचय (metabolism) को देखा जाता है।
इसमें रेडियोधर्मी ग्लूकोज़ (FDG) को शरीर में इंजेक्ट किया जाता है।
कैंसर कोशिकाएं सामान्य कोशिकाओं की तुलना में ज्यादा ग्लूकोज़ उपयोग करती हैं, इसलिए स्कैन में वे जगहें ज्यादा चमकदार (highlighted) दिखाई देती हैं।
PET स्कैन हर मरीज को नहीं किया जाता। डॉक्टर इसे खास परिस्थितियों में सुझाते हैं, जैसे:
कैंसर का पता लगाने के लिए
शरीर में कहीं छुपा हुआ कैंसर तो नहीं है, यह देखने में मदद करता है।
स्टेजिंग (Staging) जानने के लिए
कैंसर किस स्टेज पर है और कितना फैला है, यह पता चलता है।
इलाज की योजना बनाने में
ऑपरेशन, रेडिएशन या कीमोथेरेपी से पहले डॉक्टर को सही जानकारी मिलती है।
इलाज का असर देखने के लिए
इलाज के दौरान या बाद में यह जांच करता है कि ट्यूमर छोटा हो रहा है या नहीं।
कैंसर वापस तो नहीं आया?
फॉलो-अप में यह पता लगाने के लिए कि कहीं कैंसर दोबारा तो विकसित नहीं हो रहा।
पूरी बॉडी का स्कैन एक बार में हो सकता है।
कैंसर की लोकेशन और एक्टिविटी दोनों की जानकारी मिलती है।
अन्य जांचों की तुलना में ज्यादा सटीक (accurate) रिजल्ट देता है।
यह टेस्ट महंगा हो सकता है।
इसमें रेडियोधर्मी दवा दी जाती है, लेकिन उसकी मात्रा बहुत कम और सुरक्षित होती है।
टेस्ट से पहले 6 घंटे तक कुछ भी खाना-पीना नहीं चाहिए (डॉक्टर की सलाह अनुसार)।
👉 निष्कर्ष
PET स्कैन कैंसर के निदान, स्टेजिंग और इलाज की योजना बनाने में बेहद महत्वपूर्ण है। हालांकि, हर मरीज को इसकी आवश्यकता नहीं होती, इसलिए इसे केवल डॉक्टर की सलाह पर ही करवाना चाहिए।