कैंसर के सही और समय पर पता लगाने में ट्यूमर मार्कर टेस्ट्स अहम भूमिका निभाते हैं। ये ऐसे प्रोटीन या पदार्थ होते हैं जो खून, मूत्र या शरीर के अन्य तरल पदार्थों में पाए जाते हैं। जब शरीर में कैंसर कोशिकाएँ बढ़ती हैं, तो कई बार ये मार्कर्स सामान्य से ज़्यादा मात्रा में बनने लगते हैं।
यह एक लैब टेस्ट है जिसमें रक्त, मूत्र या ऊतक के नमूनों की जाँच की जाती है ताकि पता चल सके कि शरीर में कोई असामान्य गतिविधि (जैसे कैंसर की वृद्धि) तो नहीं हो रही।
AFP (Alpha-fetoprotein) → लिवर कैंसर, टेस्टिकुलर कैंसर
CEA (Carcinoembryonic antigen) → कोलन, फेफड़े और ब्रेस्ट कैंसर
CA-125 → ओवरी कैंसर
CA 19-9 → पैनक्रियाज (अग्न्याशय) कैंसर
PSA (Prostate-specific antigen) → प्रोस्टेट कैंसर
β-hCG → टेस्टिकुलर और ओवरी कैंसर
✔️ कैंसर का शुरुआती संकेत पकड़ने के लिए
✔️ कैंसर का प्रकार और गंभीरता समझने के लिए
✔️ इलाज (जैसे कीमोथेरेपी) की प्रभावशीलता जांचने के लिए
✔️ कैंसर के दोबारा लौटने (recurrence) की संभावना जानने के लिए
सभी कैंसर ट्यूमर मार्कर्स से नहीं पकड़े जाते
कई बार गैर-कैंसर बीमारियों (जैसे इंफेक्शन, लिवर डिजीज) में भी मार्कर बढ़ सकते हैं
इसे अकेले कैंसर की पुष्टि के लिए नहीं इस्तेमाल किया जाता
👉 इसलिए डॉक्टर अक्सर इसे बायोप्सी, CT/MRI या अन्य टेस्ट्स के साथ मिलाकर देखते हैं।
ट्यूमर मार्कर टेस्ट कैंसर डिटेक्शन में एक महत्वपूर्ण उपकरण है, लेकिन यह अकेला निर्णायक नहीं होता। नियमित स्क्रीनिंग, अन्य टेस्ट और विशेषज्ञ की राय के साथ ही इसका सही लाभ उठाया जा सकता है।