उपवास का मतलब है — कुछ समय के लिए खाना न खाना या बहुत सीमित मात्रा में खाना।
यह शरीर को आराम, शुद्धि और रीसेट करने का मौका देता है।
भारत में उपवास सिर्फ धार्मिक परंपरा नहीं बल्कि एक प्राकृतिक हीलिंग प्रक्रिया भी मानी जाती है। 🙏
कैंसर कोशिकाएँ तेजी से बढ़ने के लिए लगातार ग्लूकोज़ (शुगर) की जरूरत रखती हैं।
जब आप उपवास करते हैं, तो शरीर में ग्लूकोज़ का स्तर घटता है —
जिससे कैंसर कोशिकाओं की ऊर्जा सप्लाई कम हो सकती है।
रिसर्च में पाया गया है कि शॉर्ट-टर्म फास्टिंग से
सामान्य कोशिकाएँ रेडिएशन और कीमोथेरेपी के नुकसान से बेहतर तरीके से बच पाती हैं।
उपवास के दौरान शरीर पुरानी या कमजोर कोशिकाओं को हटाकर
नई कोशिकाएँ बनाता है — इसे सेल रीजनरेशन कहते हैं।
यह प्रक्रिया शरीर को मजबूत और कैंसर से लड़ने में मददगार बनाती है।
फास्टिंग से शरीर में बनी क्रॉनिक इंफ्लेमेशन घटती है,
जो कैंसर की वृद्धि का एक बड़ा कारण होती है।
साथ ही, शरीर से टॉक्सिन्स बाहर निकलते हैं।
उपवास हर मरीज के लिए सुरक्षित नहीं होता, खासकर यदि व्यक्ति
कीमोथेरेपी, रेडिएशन या किसी गंभीर स्टेज के इलाज से गुजर रहा हो।
🚫 निम्नलिखित स्थितियों में उपवास से बचें:
कीमोथेरेपी के दौरान कमजोरी
वजन बहुत कम होना
शुगर या ब्लड प्रेशर की दवाइयाँ लेना
गर्भवती या स्तनपान कराने वाली महिलाएँ
👉 फास्टिंग शुरू करने से पहले हमेशा डॉक्टर या डाइटीशियन से सलाह लें।
| फास्टिंग का प्रकार | विवरण | उपयुक्त अवधि |
|---|---|---|
| इंटरमिटेंट फास्टिंग (16:8) | 16 घंटे उपवास, 8 घंटे भोजन | सप्ताह में 2–3 दिन |
| फ्रूट या लिक्विड फास्टिंग | नारियल पानी, नींबू पानी, सूप | 1 दिन |
| रिलिजियस फास्टिंग (एकादशी/नवरात्रि) | फलाहार आधारित हल्का भोजन | शारीरिक क्षमता अनुसार |
“फास्टिंग अपने शरीर को दंड नहीं, विश्राम देने का तरीका है।” 🌸
अगर सही मार्गदर्शन में किया जाए तो यह कैंसर प्रिवेंशन,
इम्यून सिस्टम सुधार और टॉक्सिन क्लीनअप** में मदद कर सकता है।
🧘♂️ लेकिन याद रखें — हर शरीर अलग है,
इसलिए डॉक्टर की सलाह ही सबसे सुरक्षित रास्ता है। 🩺